......और 12 घंटे के लिये गांव छोड़ सरहद पार चले गये मुंडेरावासी

-ज्येष्ठ के पहले सोमवार को खाली हो जाता कुशीनगर का मुंडेरा गांव 

-बहु और बच्चे ही नहीं घर छोड़ पालतू जानवर भी चले जाते है।

 
पराह पूजा
सदियों से चली आ रही परंपरा में पराह पूजा का होता विशेष आयोजन

राघवेन्द्र मल्ल

पडरौना, कुशीनगर।उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले का मुंडेरा गांव ज्येष्ठ माह के पहले सोमवार को खाली हो गया। सुर्योदय के पूर्व अर्द्धरात्रि में ही गावं के अमीर-गरीब, बच्चे, बूढ़े सभी अपना घर व आशियाना छोडकर अगले़ 12 घंटे के लिये सरहद पार चले गये। किसी ने गांव में सूर्योदय नहीं देखा। यहां तक कि अपनी गायों, भैसों व बकरियों आदि पशुओं को भी लोग गांव से बाहर साथ लेते गये। दूसरे गांव से पानी लाकर स्नान करने, भोजन बनाने व पराह नामक विशेष पूजा की सदियों से चली आ रही परंपरा आज भी जीवंत दिखी। 

कुशीनगर जिले के खड्डा तहसील के धरनीपट्टी ग्राम सभा के मुंडेरा गांव के लोगों की ऐसी मान्यता है कि इस पूजा से आपदा कटती है और खुशहाली आती है। हर तीसरे साल जेठ महीने के शुक्ल पक्ष में पहले शुक्रवार या पहले सोमवार को यह विशेष पूजा आयोजित की जाती है। यह इतनी प्राचीन है कि इसकी गाथा गांव के बुजुर्ग भी ठीक-ठीक नही बता पाते। इस परंपरा की शुरूआत कब और कैसे हुई? यह अब कोई नही जानता पर आस्था ही है जो गांव में रहने वाले सभी वर्गों के लोगों को इस परंपरा का पालन करने के लिए प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में गांव में आई नई बहुएं, प्रसूता महिलाएं व बच्चे सभी सूर्योदय से सूर्यास्त तक गांव में नहीं रहते हैं।

इस दौरान गांव के सीवान के बाहर का ही पानी पीया जाता है। पशुओं को भी गांव के बाहर कर दिया जाता है। घर-द्वार छोड़ गांव के बाहर के बागीचें पुरूषों, महिलाओं, बच्चों से पूरे दिन गुलजार रहे। यहां लोग सूर्यास्त होने तक रहे तथा शाम को काली मंदिर में विशेष पूजा किये। इसके बाद पूरे गांव की परिक्रमा कर पताका फहराया गया। इसे लोग पराह पूजा के नाम से जानते है।

गांव के अमरनाथ सिंह कहते है उनके दादा इस बारे में जिक्र किया करते थे। सैकड़ों वर्षों पूर्व गांव में थारू जनजाति की यहां बस्ती हुया करती थी। थारुओं के स्वप्न में मां काली ने आपदा से बचने के लिए गांव के बाहर पराह करने को कहा था। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। पराह के दिन कोई गांव में पानी भी पीएगा नही तो अंधा हो जाएगा। गांव में चंदा लगाकर एक भेड़ खरीदी जाती है। इस परंपरा का निर्वहन पूरे मनोयोग से आज भी हो रहा है। 

कृष्ण प्रताप सिंह ने बताया कि शाम को भेड़ा को काली मंदिर ले जाकर उसके गले में प्रसाद बांध दिया जाता है। कुछ देर भ्रमण कराने के बाद उसके गले का प्रसाद गांव वालों में बांट दिया जाता है। इसके बाद एक दर्जन ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। इससे कोई अनिष्ट नहीं होता है। हालाकिं गांव में आई नयी बहू हो या प्रसूता सभी को सूर्योदय से सूर्यास्त तक गांव छोड़ने की परंपरा निभानी पड़ती है। बुजुर्ग लाखी देवी कहती हैं कि जब वह ब्याह कर गांव में आईं तो पराह पूजा में शामिल हुयी थी।

वह बताती है कि पराह के दिन घरों में ताले नहीं लगते, मगर चोरियां भी नहीं होतीं। लोगों में प्रेम, विश्वास व आस्था की भावना लगातार विकसित होती जा रही है। भारतीय रेल सेवा में सहायक मंडलीय रेल प्रबंधक अरूण कुमार सिंह उर्फ रिंकू ने दूरभाष पर पराह में न शामिल होने पाने की पीड़ा जताते हुये कहा कि पराह में न कोई अमीर दिखता न कोई गरीब सभी एक बागीचे में समूह में रहते। कहते हैं कि सरकारी सेवा में आने के बाद अनेक बार पराह में शामिल नहीं हो पाता, लेकिन श्रद्धा तनिक भी कम नहीं होती। गजेंद्र सिंह, शशिपाल सिंह, आशुतोष सिंह, नरेंद्र प्रताप सिंह, जितेंद्र लाल श्रीवास्तव समेत हर वर्ग के लोगों का उतसाह देखते बना।

   

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