पटवारी रिश्वतखोर तो मंत्री क्या ?

 पटवारी रिश्वतखोर तो मंत्री क्या ?

चलिए कई दिनों बाद किसी मंत्री ने शिष्टाचार की बात कही है। सुनकर अच्छा लगा कि जनता के साथ-साथ नुमाइंदे भी व्यवस्था की व्यथा से ग्रसित है। तभी तो लगाम लगाने के लिए भ्रष्टाचार पर तंज कस रहे हैं।

वह भी रिश्वत जैसी अमरबेली महामारी के हद दर्जे की आफत से कुंठित होकर। वाकई में मध्य प्रदेश के एक नामी उच्च शिक्षित मंत्री बधाई के पात्र जिन्होंने रिश्वत को रुखसत करने का साहस सुनाया। रणभेरी में भ्रष्टाचार मुक्त भारत की शुरुआत मध्य प्रदेश की सरजमीं से होने जा रही है, जिसके प्रवक्ता ये मंत्री जी बने। माननीय ने सार्वजनिक मंच से अपनी ही सरकार के अधीनस्थ सभी शासकीय पटवारियों को रिश्वतखोर बताया। 

बयान मे दम है तो स्थिति अनियंत्रित, चिंता जनक और कार्रवाई दायक है। फिर देर किसलिए सरकार फौरन रिश्वत के आकंठ में डूबे जमीन का हिसाब किताब रखने वाले पटवारियों की धर पकड़ कर कठघरे में डाल दें किसने रोका है। जब सबूत स्वयं सरकार के पास है तो ऐसे लूटखोर बेखौफ क्यों है संकीचों के पीछे क्यों नहीं? कार्रवाई न होना शंका को जन्म देता है? इसका जवाब भी इन जनाब को देना चाहिए तभी असलियत जनता के सामने आएगी। नहीं तो यह समझा जाए कि बड बोलापन, बोल वचन के अलावा कुछ नहीं हैं। इसीलिए जबान के बाद कलम चलाने में गुरेज हो रही हैं। उधेड़बून, जब सरकारी नियंत्रणी जमीनी पटवारी रिश्वत की भरमार से सराबोर है तो पूरा प्रशासनिक तंत्र और शासन के रहनुमा क्या कर रहे हैं? रखवाली! हिस्सेदारी! कहीं इनकी भी भागीदारी बराबर की तो नहीं है?

 अगर ऐसा है तो यह सरासर नाइंसाफी है साहब! पटवारियों की आड़ में अपनी कमजोरी छुपाने और सुर्खियां बटोरने वाले भद्दे मजाक से काम नहीं चलने वाला। कुछेक रिश्वतखोर पटवारियों के नाम पर सभी पटवारियों को घसीटना कदाचित ठीक नहीं है। ऐसा ही है तो मंत्रियों की रिश्वतखोरी की लंबी फेहरिस्त है कई अंदर और कई बाहर अदालत के चक्कर लगा रहे हैं। फिर यह नियम मंत्रियों के लिए भी लागू होना चाहिए कि सभी मंत्री भी ………. हैं।

या कुछ और। ऐसा कहने का साहस जुटा पाएंगे मंत्री जी? तब हम गर्व से कह सकेंगे आपके राज में मंत्री और संत्रियों के लिए बराबर न्याय है। रही! रिश्वतखोरी इस मामले में चुनिंदा पटवारियों के मुकाबले दलदल में डूबे मंत्रियों की काली कमाई बेशुमार है। आए दिन इसकी खोज-खबर देखने, सुनने और पढ़ने मिल जाना आम बात है। 

बानगी, हर 5 साल में मलाई के जमात में शामिल नेताओं की आय में 100 गुना तक बढ़ोतरी हो जाना किसी से छुपी नहीं है। बावजूद इसके ना जाने क्यों पटवारियों के पीछे पटवारी हाथ धोखे के पीछे पड़े हुए है। वजह कुछ भी हो लेकिन एक ही चश्मे से सब को देखना कहां से तर्क संगत है। अनर्गल बयान का असर यह हुआ कि प्रदेश के पटवारी 3 दिन के सामूहिक अवकाश पर चले गए। 

यदि मंत्री ने पटवारियों से सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगी तो अनिश्चितकालीन हड़ताल करेंगे। पटवारियों ने जिला कलेक्टरों को ज्ञापन सौंपकर अपने इरादे जता दिए हैं। मामले पर पटवारियों ने कहा की इससे हमारे मान-सम्मान-स्वाभिमान और अस्मिता को ठेस पहुंची। तुगलकी बयान से पटवारियों को मानसिक आघात, मनोबल टूटना और अपमानित महसूस करना लाजमी हैं। सोचनिए! गर सभी पटवारी मिलकर एक मंत्री के बारे में टिप्पणी कर देते तो इनका क्या हश्र होता अलकल्पनीय है।

यहां यह ना भूले के मंत्रियों और अफसरों की आवभगत में यही पटवारी दिन रात सर्किट हाउसों की रखवाली करते हैं। साथ ही मनपसंद की सवारी, लजीज भोजन और सामग्रियों की व्यवस्था पटवारियों के माथे आला अधिकारी जड़ देते हैं। अमला अपने कामों के अलावे घटना-दुर्घटना, आफत-राहत, धरना-आंदोलन, तीज-त्योहारों और आयोजन-महोत्सव में जुटा रहता है। ऐसे में इन सभी को अपनी नजरों से रिश्वतखोर बता देना एक जिम्मेदार मंत्री को शोभा नहीं देता। हां!

जो भ्रष्ट व गैर जिम्मेदार चाहे पटवारी हो या अफसर, नेता किवां मंत्री-मुख्यमंत्री और कोई भी हो उसे हर हाल में बख्शा नहीं जाना चाहिए। इसी कदम ताल की देश के जवान-मजदूर-किसान और हर इंसान को बरसों से दरकार है। अब, देखना है यह कब तलक मुकम्मल होती है।

(हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक एवं विचारक)

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