भाजपा के मुकाबले उ.प्र. में क्या होगी सपा की रणनीति 

भाजपा के मुकाबले उ.प्र. में क्या होगी सपा की रणनीति 

लोकसभा चुनाव के दौरान भले ही भारतीय जनता पार्टी समाजवादी पार्टी से कुछ सीटें पीछे रह गई लेकिन अब भी भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में कमजोर समझना सपा और कांग्रेस की भूल होगी। यह कुछ इस तरह के आंकड़ों का खेल है जो जरा भी इधर उधर खिसके तो परिणाम बदलते देर नहीं लगती। यह निश्चित है कि लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को वो सफलता प्राप्त नहीं हुई जो वह उम्मीद किए बैठी थी। लेकिन इसका जो असली खेल है वह है जातिगत आंकड़ों का और यह सत्य है कि अखिलेश यादव ने पीडीए का नारा देकर सफलता प्राप्त की है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का जो संयोजन अखिलेश यादव ने इस बार किया है वह भारतीय जनता पार्टी पर भारी पड़ गया।
 
समाजवादी पार्टी के गठन से लेकर अब तक शायद यह पहला चुनाव होगा जिस तरीके से अखिलेश यादव ने टिकटों का वितरण किया हो। यह बात सोचने को मजबूर कर देगी कि कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में दी गई सीटों के बाद सपा के पास जितनी सीटें थीं उनमें समाजवादी पार्टी की तरफ से केवल पांच यादव उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे। और सबसे बड़ा ताज्जुब तो यह है कि यह पांचों यादव उम्मीदवार केवल अखिलेश यादव के घर से ही थे उनमें स्वयं अखिलेश यादव और डिंपल यादव शामिल हैं।
 
इसके अलावा धर्मेंद्र यादव आजमगढ़ से अक्षय यादव फिरोजाबाद से और शिवपाल सिंह यादव के पुत्र आदित्य यादव बदायूं से उम्मीदवार थे।इस पर भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी को घेरना शुरू कर दिया है कि सपा के लिए यादव का मतलब है सिर्फ अखिलेश यादव का परिवार। इसी तरह मुस्लिम उम्मीदवारों को भी समाजवादी पार्टी ने बहुत ज्यादा सीटों पर चुनाव नहीं लड़ाया। पिछड़े वर्ग में यादवों के अलावा अन्य जातियों को भी अखिलेश यादव ने अच्छा समायोजित किया था। जब लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव का पीडीए सफल हुआ तब वह आगामी 2027 के चुनाव को भी इसी फार्मूले के साथ लड़ना चाहते हैं। अखिलेश यादव ने जिस तरह का प्रयोग किया है उससे यह तो स्पष्ट हो गया कि अब समाजवादी पार्टी केवल यादवों की पार्टी नहीं रह गई। जिसके लिए पहले सपा के ऊपर हमला किया जाता था। अखिलेश यादव ने बड़ी ही चतुराई से माता प्रसाद पाण्डेय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया है। मतलब ब्राह्मण वोटों पर भी अखिलेश यादव की नजर लगी है।
 
भारतीय जनता पार्टी भी अब यह समझ चुकी है कि जिस तरह से पहले टिकटों का वितरण किया जाता था अब उस तरह से नहीं चलने वाला है। इस लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी के लिए कहावत थी कि भाजपा में उम्मीदवार मायने नहीं रखता बल्कि भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की छवि ही किसी विरोधी को हरा पाने के लिए काफी है। उत्तर प्रदेश में चुनाव में मुद्दा कुछ भी हो लेकिन बोलबाला जातियों का ही रहता है और यह बात अब भारतीय जनता पार्टी ने भी समझ ली है और इस 2027 के चुनाव में यह देखने को भी मिलेगा। भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपने जितने भी सहयोगी बनाए हैं वह सभी एक एक जाति का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। वह बात अलग है कि इस बार इनका जादू नहीं चला क्यों कि समाजवादी पार्टी ने ऐसे प्रत्याशी दिए जिन्होंने अच्छी तरह से इन पार्टियों की काट की। और उसका परिणाम सबके सामने है।
 
अखिलेश यादव पूरे चुनाव में पीडीए का नारा देते रहे। लेकिन यह चुनाव बहुजन समाज पार्टी के लिए घातक हुआ क्योंकि इस चुनाव में दलित वोट का एक बहुत बड़ा हिस्सा भी बहुजन समाज पार्टी से खिसककर समाजवादी पार्टी की तरफ गया है। अब चाहें तो इसको मायावती का दबे मन से चुनाव लड़ना मान लें या अखिलेश यादव का प्रबंधन। पहले दलित का मतलब था बसपा लेकिन इस चुनाव में वह भी भ्रम दूर हो गया है। लेकिन यह निश्चित है कि 2027 के उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की तरफ से कुछ अलग ही संयोजन देखने को मिल सकता है। जिस तरह का संयोजन समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव में किया था। 2014 के बाद यह पहला मौका है जब किसी भी चुनाव में भारतीय जनता पार्टी समाजवादी पार्टी से पीछे रह गई। इसको लेकर भारतीय जनता पार्टी में भी हलचल सी मची हुई है। 
 
एक बार बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने भी कुछ इसी तरह की सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अपनाया था। और बसपा की पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार उत्तर प्रदेश में बनी थी। उस चुनाव में ब्राह्मण ने पूरी तरह से बहुजन समाज पार्टी का साथ दिया था। तब भारतीय जनता पार्टी कमजोर थी और उसी का फायदा बहुजन समाज पार्टी ने उठाया था। 2027 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा कांग्रेस गठबंधन को भारतीय जनता पार्टी के अगले दांव से निबटना होगा क्योंकि कि इन ढाई साल में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी निश्चित ही अपनी पकड़ मजबूत करने पर काम करेगी। भले ही लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी पीछे रह गई हो, भले ही अयोध्या की सीट हार गई हो लेकिन उनका हिंदुत्व का मुद्दा आज भी वह हैसियत रखता है कि चुनाव परिणाम को किसी भी समय अपने पक्ष में कर सकता है।
 
योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व के एक बड़े नेता के रुप में पहचाने जाने लगे हैं। और यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई में इतनी उठापटक के बाद भी योगी आदित्यनाथ को हिलाने की बिल्कुल भी जहमत नहीं उठाई। लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने जितनी भी सीटें पाईं हैं उसमें भी योगी आदित्यनाथ का बहुत बड़ा योगदान और उनकी हिंदुत्ववादी छवि का ही है। हालांकि कुछ मामलों में उन्होंने लचीला पन दिखाया है लेकिन जिस तरह से कांवड़ यात्रा को उन्होंने इतना महत्व दिया है वह हर किसी के मन में है। हिंदुत्व के जो तेवर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास हैं वह शायद आज भारतीय जनता पार्टी के किसी नेता के पास नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अब हिंदुत्व पर इतना नहीं बोल पाते हैं क्योंकि वह देश के प्रधानमंत्री हैं और उन्हें एक समान सभी के लिए बोलना होता है।
 
उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का पिछड़ना चिंता का विषय है लेकिन योगी आदित्यनाथ के रहते वापसी करना मुश्किल भी नहीं है। और यही कारण है कि जब पूरा प्रदेश नेतृत्व योगी आदित्यनाथ को जिम्मेदार ठहरा रहा था तब मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि हार का कोई दूसरा कारण नहीं है। अतिआत्मविश्वास के कारण हम हारे हैं। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के बराबर का कोई नेता भारतीय जनता पार्टी के पास नहीं है। नहीं तो भारतीय जनता पार्टी आलाकमान जिस तरह से परिवर्तन करता है वह किसी से छिपी बात नहीं है। मध्यप्रदेश में लगातार चौथी जीत के बाद भी शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री पद से हटाकर मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाना भारतीय जनता पार्टी आलाकमान ही कर सकता है। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति अलग है। यहां अयोध्या है, मथुरा है, काशी है जो हिन्दू के लिए एक अहम मुद्दा है। और उत्तर प्रदेश में हिंदुत्ववादी नेता की पहचान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से ही शुरू होती है।
 
कांग्रेस और सपा गठबंधन को भी अति आत्मविश्वास से हटना ही उनके लिए बेहतर होगा। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के वोट प्रतिशत में ज्यादा कमी नहीं आई है। बस सपा का संयोजन ही उसको सफलता दिलाने में सहायक हुआ है। लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने तेजी से विकास में गति प्रदान की है। वो सभी अधूरी परियोजनाओं को 2027 से पहले पूरा कर लेना चाहते हैं। लेकिन कहीं न कहीं केन्द्र की ऐसी कमियां भी सामने आईं हैं। जिससे लोगों का ध्यान भटका है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी कभी भी अपने आप को ऊपर उठा सकती है यह बात समाजवादी पार्टी भी जानती है और इसीलिए अखिलेश यादव अतिउत्साहित नहीं हैं और पार्टी को और मजबूत करने की तरफ ध्यान दे रहे हैं।
 
जितेन्द्र सिंह पत्रकार 

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