शतरंज की दुनिया में भारत का डंका

शतरंज की दुनिया में भारत का डंका

 
                 (नीरज शर्मा'भरथल') 
 
64 मोर्चों में बंटी लगभग 21 ईंच × 21 ईंच की दो साम्राज्यों के बीच सजी रणभूमि, 32 योद्धा और युद्ध का संचालन करते 2 खिलाडी। रणबांकुरे राजा, खुंखार वजीर, हिनहिनाते घोड़े, दौड़ते ऊंट, चिंघाड़ते हाथी, हुंकारते सैनिक परन्तु माहोल बिल्कुल शांत, इतना शांत कि जमीन पर गिरी सुई की आवाज भी सुनाई दे जाए। यह दृश्य है शतरंज के मुकाबले का, दो खिलाड़ियों के बीच खेले जाने वाला यह खेल किसी व्यक्ति के बुद्धी कौशल को दर्शाता है। शतरंज दिमाग का खेल है। इस खेल में रणनीतिक और आलोचनात्मक सोच की आवश्यकता होती है। समस्या के समाधान को ढूंढ़ने की क्षमता की जरूरत होती है।
 
शतरंज मस्तिष्क का व्यायाम है। इससे मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है। शतरंज खेलने से तार्किक और स्वतंत्र रूप से सोचने सीखने में मदद मिलती है। शतरंज खेलने से बच्चों के चरित्र और प्रतिस्पर्धी भावना का विकास होता है। 12 दिसंबर 2024 को शतरंज विश्व चैम्पियनशिप जीत 18 साल के भारतीय शतरंज ग्रैंडमास्टर डी.गुकेश ने इतिहास रच दिया। विश्व शतरंज चैंपियन बने गुकेश इस खिताब को जीतने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बन गए हैं। उनकी इस उपलब्धी ने उन्हें इतिहास के पन्नों में हमेशा हमेशा के लिए अमर कर दिया है। गुकेश की इस उपलब्धि से पहले रूस के महान गैरी कास्पारोव सबसे युवा विश्व शतरंज चैंपियन थे, उन्होंने 1985 में अनातोली कार्पोव को हराकर 22 वर्ष की आयु में यह खिताब जीता था।
 
विश्वनाथन आनंद के बाद गुकेश दूसरे भारतीय हैं, जिन्होंने वर्ल्ड चैंपियन का खिताब अपने नाम किया। डी.गुकेश से पहले भारत की ओर से विश्वनाथन आनंद पहली बार सन 2000 में विश्व चैंपियन बने थे। विश्वनाथन आनंद ने विश्व चैम्पियन का खिताब 2012 तक पांच बार अपने नाम किया था। इतिहास के अनुसार शतरंज की उत्पति भारत मे सातवीं शताब्दी के आसपास हुई और इसका प्राचीन या कहें असली नाम चतुरंग है। इतिहासकारों के अनुसार भारत से यह खेल फारस यानि आज के ईरान में पहुंचा जहां इसे भारतीय उप-महाद्वीप में आज का प्रचलित नाम शतरंज मिला। फारस से चतुरंग खेल युरोपियन देशों तक पहुंचा जहां इसको चेस नाम मिला। विश्व के ज्यादातर भागों में इस खेल को चेस नाम से ही पहचाना जाता है।
 
यदि शतरंज के आधुनिक युग की बात करें तो इस खेल की स्पर्धाओं में अधिकांश समय सोवियत संघ या कहें रूस के खिलाड़ियों का ही दबदबा रहा है। वर्ल्ड चेस चैंपियनशिप का इतिहास बहुत पुराना है, जिसमें खेल के महानतम खिलाड़ियों की प्रतिभा देखने को मिलती है। शतरंज की पहली आधिकारिक विश्व चैंपियनशिप सन 1886 में अमेरिका में हुई। इसके मैच न्यूयॉर्क शहर, सेंट लुइस, और न्यू ऑरलियन्स में खेले गए थे। इस चैंपियनशिप के फाइनल में आस्ट्रिया के विल्हेम स्टीनिट्ज ने पोलैंड के ब्रिटिश खिलाडी जोहान्स जुकेर्टोर्ट को हराकर पहला विश्व शतरंज चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम किया था। 1886 में पहले खिताबी मुकाबले के बाद से, चैंपियनशिप का विकास हुआ है, जिसमें प्रतिष्ठित चैंपियन सामने आए हैं
 
जिन्होंने शतरंज में युगों को परिभाषित किया है। अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ (एफआईडीई) का गठन 20 जुलाई 1924 को फ्रांस के शहर पैरिस में हुआ। इसी तारिख को हर साल विश्व शतरंज दिवस मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ  ने साल 1948 में एफआईडीई विश्व शतरंज चैंपियनशिप की शुरुआत की थी। जर्मनी के इमानुएल लास्कर, शतरंज के एक महान खिलाड़ी हुए हैं। उन्होने ने 1894 से 1921 तक छह बार विश्व शतरंज चैंपियनशिप खिताब अपने नाम किया। क्यूबा के जोस राउल कैपब्लांका, जो अपनी स्थितिगत प्रतिभा के लिए जाने जाते हैं, ने 1921 में खिताब जीता, लेकिन 1927 में अलेक्जेंडर अलेखिन से हार गए। अलेखिन ने दो अलग-अलग चरणों में ताज अपने नाम किया, जिसमें कुल मिलाकर चार जीत हासिल कीं।
 
मैक्स यूवे ने 1935 में कुछ समय के लिए अलेखिन के प्रभुत्व को बाधित किया, लेकिन 20वीं सदी के मध्य में सोवियत वर्चस्व का युग शुरू हुआ। मिखाइल बोट्विननिक एक निर्णायक व्यक्ति के रूप में उभरे, जिन्होंने 1948 और 1963 के बीच पांच खिताब जीते। इस अवधि के दौरान, वासिली स्मिस्लोव, मिखाइल ताल और तिगरान पेट्रोसियन जैसे अन्य सोवियत महान खिलाड़ियों ने अपनी छाप छोड़ी। 1970 के दशक में शतरंज की ओर दुनिया का ध्यान गया, जब 1972 में अमेरिका के बॉबी फिशर ने शानदार जीत हासिल की और खिताब पर सोवियत का कब्ज़ा तोड़ दिया। इसके बाद अनातोली कारपोव और गैरी कास्पारोव ने अपनी शानदार प्रतिद्वंद्विता से आधुनिक शतरंज को आकार दिया, जिसमें कास्पारोव ने 1985 से 2000 के बीच छह खिताब जीते।
 
2000 से 2012 तक भारत के विश्वनाथन आनंद ने 5 खिताब जीते। 21वीं सदी में चैंपियनों की एक नई पीढ़ी देखने को मिली।विश्वनाथन आनंद, व्लादिमीर क्रैमनिक और मैग्नस कार्लसन ने अपनी नई शैली से खेल को नई परिभाषा दी। कार्लसन के वर्चस्व का काल जो 2013 से 2023 तक एक दशक तक चला, ने उन्हें आधुनिक शतरंज के दिग्गज के रूप में स्थापित किया। 2023 में डिंग लिरेन नवीनतम चैंपियन बने। 2024 में भारत के डी.गुकेश चैंपियन चैंपियनशिप के शानदार इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। भारत में शतरंज के पुनरुत्थान की बात करें तो इसमें प्रमुख हाथ रहा सन 2000 विश्वनाथन आनंद की विश्व चैंपियन जीत का, विश्व इतिहास में विश्वनाथन आनंद नाम  शतरंज के महानतम खिलाड़ियों में शुमार है।
 
अब डी.गुकेश, अर्जुन एरिगैसी और अन्य नए प्रतिभावान खिलाड़ी आनंद की बेजोड़ विरासत को आगे ले जाएंगे। आनंद के बाद यह खिताब जीतने वाले गुकेश दूसरे भारतीय हैं। आनंद ने चेन्नई में अपनी शतरंज अकादमी में गुकेश को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और चार साल में ही चैंपियन बना दिया। 

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