शिक्षक दिवस: आत्म-मंथन का दिन ​​​​​​​

मंथन करने की महती  आवश्यकता है केवल अच्छी शिक्षा नीति देने भर से काम नहीं चलेगा उससे और आगे विचारने और काम करने की आवश्यकता है 
 
शिक्षक दिवस: आत्म-मंथन का दिन  ​​​​​​​

स्वतंत्र प्रभात 

पिछले लगभग छह दशकों से भारत अपने पूर्व राष्ट्रपति एवं भारत रत्न डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मना रहा है। इस दिवस को मनाने के पीछे मेरी समझ में यही मंशा रही होगी कि समाज में शिक्षकों का आदर सम्मान बड़े, शिक्षार्थी और शिक्षक के बीच में संवाद सदैव बना रहे तथा विधार्थियों में शिक्षक प्रोफेशन के प्रति आकर्षण पैदा हो,शिक्षक शिक्षा देने के महत्व को समझते हुए पूर्ण निष्ठा, ईमानदारी, मेहनत और लगन से शिक्षा देने के महत्व पूर्ण दायित्व का निर्वहन करें।  इस दिवस पर स्कूलों में  हमें जहां विद्यार्थी अपने शिक्षक का रोल अदा करते , सम्मानित करते नजर आते हैं वहीं उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थी अपने अपने शिक्षक का विभिन्न तरीके से मान- सम्मान करते, प्रोग्राम आयोजित करते हुए उत्साहित दिखाई देते हैं।इस दिन सामाजिक एवं सरकारी संगठन भी शिक्षक को सम्मान देने में पीछे नजर नहीं आते। शिक्षक दिवस पर देश में श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की चर्चा होती है। समाज एवं राष्ट्र उन्हें ही आदर्श शिक्षक के रूप में मानता और मानें भी क्यों नहीं । आपने अपने ज्ञान कौशल और शिक्षा के माध्यम से शिक्षक ,कुलपति, शासक, उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों को बड़ी कुशलता से निभाया है। देश ने आपके इन योगदान को देखते हुए भारत रत्न से सम्मानित किया।एक आदर्श शिक्षक के रूप में क्या गुण होना चाहिए इसका सबसे अच्छा उदाहरण डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का 40 वर्षीय शिक्षकीय जीवन है, उनका व्यक्तित्व, चरित्र और जीवन दर्शन है। डॉ राधाकृष्णन प्रकांड विद्वान, महान शिक्षाविद, दार्शनिक, अच्छे लेखक, प्रभावी वक्ता, कुशल प्रशासक एवं राजनीतिज्ञ रहे हैं। आप शिक्षक के रूप में विद्यार्थियों में हमेशा राष्ट्रीय चेतना का भाव जगाते रहे।  लोगों की भलाई के कार्यों के लिए समर्पित रहे हैं। नियम और सिद्धांतों का पालन करना अपना हमेशा प्रमुख कर्तव्य समझा।आपका दृष्टिकोण व्यापक रहा आप भारतीय संस्कृति- परंपरा के संवाहक तथा आस्थावान हिंदू

विचारक रहे हैं। भारतीय दर्शन के साथ-साथ आप बौद्ध एवं जैन दर्शन के भी  बड़े जानकार थे। आप हमेशा छल-कपट से दूर, अहंकार रहित,मित्रता के पक्षधर, ईमानदार व्यक्तित्व के धनी थे। आप में विचारों, कल्पनाओं और  भाषा द्वारा विलक्षण ताना-बाना बुनने की अद्भुत क्षमता थी। पढ़ाने से पहले स्वयं अध्ययन करना आपकी आदत में था। गंभीर विषयों को सरल बना कर अपने विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत करना आपकी विशेषता थी। आप हमेशा बुद्धिमत्तापूर्ण व्याख्याओं, आनंददायी अभिव्यक्ति, हंँसाने- गुदगुदाने वाली कहानियों से अपने विद्यार्थियों को मंत्रमुग्ध कर दिया करते थे। आपका व्यक्तित्व उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने की प्रेरणा देता है और आपके विचार सरल और सहज होने के बावजूद विश्व का दिशा दर्शन करते हैं। आज का शिक्षक डॉक्टर राधाकृष्णन के समस्त शिक्षकीय तत्वों, गुणों को अपने अंदर विकसित करने की क्षमता तो शायद नहीं रखता है किंतु उन्हें आदर्श शिक्षक मानते हुए उनके  अधिक से अधिक शिक्षकीय  गुणों को अपने अंदर विकसित करने का प्रयास अवश्य कर सकता है, और करना भी चाहिए। यह शिक्षा की उन्नति तथा बेहतरी के लिए आवश्यक भी है और शिक्षक , शिक्षार्थी और राष्ट्र के लिए अच्छा भी है। अतः आज के दिन को शिक्षार्थी और शिक्षक को डा कृष्णन  के नजरिए से देखने की आवश्यकता है। आपका मानना था "शिक्षा के द्वारा मानव मस्तिष्क को सदुपयोग के लिए तैयार किया जा सकता है। शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध लड़ सके। वहीं दूसरी ओर शिक्षक के बारे में आप का मानना था कि " शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ढूंसे, बल्कि वास्तविक शिक्षण तो वह है जो अपने विद्यार्थियों को आने वाले कल की चुनौतियों के

लिए तैयार कर सके"अतः मेरी नजर में आज का दिन सभी के लिए आत्ममंथन का दिन है। शिक्षकों को विचारना होगा कि राष्ट्र एवं समाज ने उनसे जो अपेक्षाएंँ की हैं उस पर क्या वे खरे उतर रहे हैं? क्या आज का शिक्षक अपने विधार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ व्यवहारिक और कौशल ज्ञान दे रहे हैं? क्या वे नैतिक मूल्यों से युक्त चरित्रवान, आत्मनिर्भर, राष्ट्रभक्त नागरिक बनाने की दिशा में सहयोग कर रहे हैं? क्या उनका आचरण और चरित्र ऐसा है, जिसे देखकर विद्यार्थी कुछ सीख सकें, उसे अपने जीवन में उतार सकें, उसे अपना आदर्श बना सकें? विद्यार्थियों को भी आत्मान्वेषण करना चाहिए कि क्या वे सही मायने में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं? अपने शिक्षक के ज्ञान और अनुभव का लाभ ले रहे हैं? अपने जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करने में अपने शिक्षकों का प्रोत्साहन प्राप्त कर रहे हैं?शासन को भी मंथन करने की आवश्यकता है कि क्या शासन की नीतियांँ राष्ट्र के प्रणेता की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही‌ पर हैं? क्या शासन शिक्षकों को समाज में प्रतिष्ठा दिलाने में सहायक है? स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक क्या शिक्षक को शिक्षाकर्मी, संविदा शिक्षक, अतिथि शिक्षक, अनुबंध शिक्षक बनाना शिक्षा और शिक्षा जगत के हित में है? क्या शिक्षक से शिक्षा के अतिरिक्त अन्य कार्य करवाना शिक्षार्थी और समाज के हित में है?  क्या इससे शिक्षक का मूल दायित्व प्रभावित नहीं होता? क्या शिक्षकों के रिक्त पदों को स्थाई शिक्षकों से नहीं भरा जा सकता?आदि  अनेक प्रश्न है जिसके उत्तर खोजना होगा और सर्वमान्य हल निकालने के  बारे में शासन-प्रशासन और राजनेताओं को भी

   

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