स्व.सुधाकर तिवारी के गांव में तेरहवीं पर हुआ मानवीय करुणा का ऐहसास

 
 तिवारी के गांव में तेरहवीं पर हुआ मानवीय करुणा का ऐहसास

स्वतंत्र प्रभात प्रयागराज ।
ब्यूरो दया शंकर त्रिपाठी की रिपोर्ट।


    कुछ स्मृतियाँ जीवन भर मन को मथती रहती हैं । परंपरा कि प्रवाहमयता को रक्त मे अनुभव करना चाहिए । बिछुड़े शख्स की यादें अपने अस्तित्व की खोज ही है । अपने यादों की गहरी जड़ों में जाकर अपना चेहरा देखने की कोशिश परम्परा निर्वाह मे मिलती हैं । उसी परम्परा निर्वाह के तहत जितेन्द्र - सुरेन्द्र - मनोज और तिवारी परिवार ने अति विस्तृत मित्र मण्डली के साथ परम पूज्य अपने स्वर्गीय  पिता को जो श्रद्धा सुमन अर्पित किया वह अद्भुत अविस्मरणीय था ।

स्व.सुधाकर तिवारी के गांव में तेरहवीं पर हुआ मानवीय करुणा
 मौका था स्वर्गीय सुधाकर तिवारी के 13 वी का जो उनके पैतृक गांव मलिकपुर नोनरा में आयोजित किया गया था ।जिसमे हजारों की संख्या में सामिल हुए तिवारी के मित्र मंडली उनके परिवार के सभी जन तथा इफको अधिकारी संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेंद्र तिवारी के सामाजिक सरोकार परोपकार तथा आतिथ्य सत्कार के गुणों की गवाही दे रहा था ।

कोई 200 किलोमीटर की दूरी से आया था तो कोई क्षेत्र के 5 और 10 किलोमीटर की दूरी से लेकिन बचा कोई नहीं जो तिवारी परिवार के द्वारा  आयोजित इस भोज में नहीं शामिल हुआ । भोज में शामिल हुए कोई भी ऐसा व्यक्ति मित्र शुभचिंतक नहीं  बचा था जो तिवारी जी के बड़े पुत्र जितेंद्र तिवारी की नजरों से बच पाया हो और उसका उन्होंने हृदय से स्वागत ना किया हो ।उनके इसी शानदार गुणों के तो सभी मुरीद हैं ।इस भोज में  क्षेत्र का ब्राह्मण समुदाय था तो  इफको संस्था के उच्च अधिकारी से लेकर कर्मचारी संघ अधिकारी संघ और मजदूर तक 200 किलोमीटर से दूर आकर भी सम्मिलित हुए राजनेता पत्रकार गण तथा कोई भी वर्ग ऐसा नहीं बचा जो तिवारी को अंतिम बार श्रद्धांजलि देने से वंचित रहा हो ।

स्व.सुधाकर तिवारी के गांव में तेरहवीं पर हुआ मानवीय

उल्लेखनीय है कि श्री तिवारी का लखनऊ में उनके निजी आवास पर 13 दिन पूर्व निधन हुआ था। स्वर्गीय सुधाकर तिवारी खुद भी बहुत ही लोकप्रिय और सामाजिक समरसता और  उदार हृदय वाले व्यक्ति थे ।उन्होंने उच्च पदों पर नौकरी करते हुए भी गरीबों और जरूरतमंदों की भरपूर मदद किया ।लोगों का कहना है यह कार्यक्रम बहुत दिनों तक मानस पटल पर याद रहेगा ।
और अंत में यही कहा जा सकता है कि श्मशान सिर्फ मृत्यु का भय नहीं.बल्कि मानवीय चेष्टा का करुण ऐहसास भी हैं।

   

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