पं.नंदकिशोर मिश्र ने जनहित के लिए अपने ही सरकार के खिलाफ खोल दिया था मोर्चा

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राजनीति
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◆ जनहित के लिए अपने सरकार में ही मोर्चा खोलना आसान नहीं ◆ राजनीति में पूर्व विधायक नन्दकिशोर मिश्र की है अलग पहचान

अशोक वत्स

राजनीतिक विश्लेषण

तमकुहीराज,कुशीनगर। वर्तमान राजनीति के दौर में नेता अपने दौर को लेकर चर्चा में तो रहते है, लेकिन वोट के समीकरण में वे हासिये पर नजर आते है, लेकिन उसमे कुछ ऐसे भी चेहरे देखने को मिलते है कि वह हर परिस्थिति में अपने दौर को आज भी बनाये हुए है। कुशीनगर के राजनीति में विभिन्न दलों से सम्बन्ध रखने वाले दर्जनों नेता ऐसे है, जो आम आदमी और जनहित को लेकर संघर्ष कर अपनी जमीन तैयार कर अपने दलों के प्रिय या फिर उसकी मजबूरी है। लेकिन वर्तमान के राजनैतिक परिदृश्य में जहां धन, बल के साथ जातीय समीकरण और मण्डल कमंडल के दौर में अपने राजनैतिक जमीन को बचाये रखना अचंभित करने जैसा है।

332 तमकुहीराज विधानसभा संघर्षों के लिए जाना जाता है। यहां चुनाव जीतने के लिए आज भी प्रत्याशी के जनहित के लिए किए गये संघर्ष को जनता सबसे पहले देखती हैं, फिर पार्टी की नीति और जातीय समीकरण मजबूत आधार बनता है। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति बीते चार दशक से अपने राजनैतिक जमीन को हर चुनाव में ऊर्जावान बनाते आया हो तो उसकी चर्चा होगी ही।

कुशीनगर जिले में ऐसा ही एक नाम है। पूर्व विधायक पंडित नन्दकिशोर मिश्र की। श्रीमिश्र अस्सी के दौर में आरएसएस के प्रचारक के दायित्व से आगे निकल राजनीति में कदम रखा, भाजपा के संगठन को खड़ा करने के साथ दो बार विधायक रहें। भाजपा के कल्याण सिंह के सरकार में विधायक होते हुए भी जमुआन पुल के लिए अपने ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और श्रमदान से करोड़ो रूपये का काम करा आम आदमी के बीच श्रमदानी बाबा के रूप में चर्चित हो गए। उस दौर में यह क्षेत्र गन्ना, गण्डक और गुंडा के नाम से पहचान बना चुका था, तब जंगल पार्टी के नाम गुंडा नामक रोग से मुक्ति दिलाने के लिए लगभग एक दर्जन पुलिस चौकियों की स्थापना करा आधुनिक असलहों से लैश पुलिसकर्मियों की तैनाती करायी थी। बड़ी गण्डक नदी के कटान से प्रभावित लोगों को पट्टा दिला उन्हें बसाने की पहल की थी। इतना ही नहीं उस दौरान किसानों के गन्ने की पेराई किये ही चीनी मिल बन्द हो गयी थी तो उन्होंने किसानों के खेत मे खड़े गन्ने का भुगतान कराया था। तो वहीं तब के अति पिछड़े इस क्षेत्र में विकास का नींव रखते हुए आम आदमी के साथ न्याय के लिए भी अपने और पराये के भेद को भी मिटाने का प्रयास किया था। उन्होंने गन्ना, गण्डक और गुंडा पर अपने अल्पकाल के विधायकी में जबरजस्त चोट किया था।

क्षेत्र में बढ़ते जनाधार और संगठन पर मजबूत पकड़ के कारण नन्दकिशोर मिश्र भाजपा के लिए मजबूरी बन गये थे, लेकिन अचानक वर्ष 2017 में पार्टी ने लगातार जनाधार बढ़ने के बाद भी हारने के कारण उनका टिकट काट दिया, लेकिन श्री मिश्र के निर्दल चुनाव मैदान में आने के कारण मोदी और भाजपा की बड़ी लहर के कारण भाजपा चुनाव हार गयी। श्रीमिश्र आज सपा में है, उनकी जमीन आज भी उतनी ही ऊर्जावान है कि हर कोई यही कह रहा कि चुनाव में कोई भी दल या नेता उन्हीं से लगेगा। जानकार यह बताते है कि बड़े नेताओं को छोड़ दे तो क्षेत्रीय स्तर पर हर नेता का एक दौर होता है, एक या दो चुनाव हारने के बाद उसकी चर्चा तो होती है, लेकिन उसकी राजनीतिक जमीन ऊसर या बंजर हो जाती है। लेकिन लगातार आधा दर्जन से भी अधिक चुनाव हारने के बाद अगर हर चुनाव में बड़े दल या नेता उसी व्यक्ति से लड़ने की कसरत करते हो तो यह राजनैतिक इतिहास में आश्चर्च से कम नहीं कहा जा सकता।

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