मौलाना जव्वाद अस्करी ने करबला का वाक़या बयां कर अजादारों की आंखे करी नम

 
मौलाना जव्वाद अस्करी ने करबला का वाक़या बयां कर अजादारों की आंखे करी नम

स्वतंत्र प्रभात 

मोहर्रम का चांद दिखाई देने के साथ ही मुस्लिम समाज में रंजो गम का सिलसिला शुरू हो गया। खास तौर पर शिया समुदाय में महिलाओं ने अपने घरों में काला लिबास पहन लिया और चूड़ियां उतार दीं। वही चार मोहर्रम को सादिक़ हुसैन के आवास पर मजलिस हुई। जिसको मौलाना जव्वाद अस्करी ने खिताब किया। मजलिस में उन्होंने करबला का वाकया सुनाया। जिसे सुनकर अजादारों के आंसू निकल आए। मजलिस में मौलाना जव्वाद अस्करी ने बताया कि मुहर्रम शिया समुदाय का खुशी का नहीं बल्कि गम का महीना है। मुहर्रम अरबी कैलेंडर का पहला महीना है और इस महीने में ही हजरत इमाम हुसैन अलैहि सलाम के पूरे परिवार को आतंकी यजीद ने कत्ल करवा दिया था। इन सभी शहीदों को सिर्फ इस लिए शहीद कर दिया गया क्योंकि ये हक, इंसानियत और सच के रास्ते पर थे। सिर्फ इस्लाम ही नहीं बल्कि मानवता को भी बचाना चाहते थे। लेकिन यजीद और उसकी फौज दहशतगर्दी को कायम करना चाहते थे। उन्होंने बताया कि दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ पहली जंग करबला में हुई, जो हजरत इमाम हुसैन अलैहि सलाम ने 71 साथियों के साथ लड़ी थी। अजादारों ने या हुसैन, या हुसैन की सदाएं बुलंद कीं। इस दौरान भारी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे।

 

   

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