जगजीवन साहेब ने अपने जीवन में हमेशा की लोगों की सेवा-महन्त कौसल किशोर

जगजीवन साहेब ने अपने जीवन में हमेशा की लोगों की सेवा-महन्त कौसल किशोर

रिपोर्ट-अंकुर यज्ञसेनी

जनपद बाराबंकी के श्री कोटवाधाम में जगजीवन साहेब ने मानव जीवन व्यतीत कर लोगों की सेवा की ज्ञात हो कि समाज में जब जब अनाचार एवं अत्याचार अपने चरम उत्कर्ष पर होता है।

तब तब ईश्वर का अंश अवतार अथवा पूर्ण अवतार होता है और आतताईयों शक्तियों का, दुष्टों का विनाश होता है तथा उस काल के अनुरूप सामाजिक मान्यताओं, धर्म आचरण एवं उत्थान के सिद्धांत प्रतिपादित होते हैं ऐसे महापुरुषों के अभ्युदय के कीर्ति गाथा उनके अनुयायियों द्वारा आराधना एवं उपासना रूप में सुनी और गाई जाती रही है ।

जो परंपरा आज भी विद्यमान है इसी क्रम में दिव्यमान संत के परिचय से अवगत कराते हैं जिनका नाम जगजीवनदास साहब है।

बताते चलें कि इनका जन्म आज से लगभग 343 वर्ष पूर्व दिन मंगलवार माघ शुक्ल सप्तमी संवत 1722 विक्रमी, सन 1671 में प्रातः काल ग्राम सरदहा में जो कि वर्तमान में थाना बदोसराय जिला बाराबंकी उत्तर प्रदेश में स्थित है ।

कब हुआ था जगजीवन साहेब का जन्म

जगजीवन साहेब ने चंद्रवंशी क्षत्रिय ठाकुर गंगाराम जी की भर्या केवला देवी के गर्भ से जन्म लिए थे। जो आगे चलकर जगजीवनदास नाम से प्रसिद्धि मिली और भक्ति भाव से लोग इन्हें बड़े बाबा के नाम से गुणगान करते हैं बताते चलें कि जन्म लेने के 1 माह उपरांत से ही ईश्वरीय गुण संपन्न होने के कारण स्वामी जी अद्भुत कौतुक किया करते थे

संभवत जिनका उद्देश्य भ्रमित समाज को सन्मार्ग पर लाना ही था और समाज में व्याप्त कुरीतियों तथा नवजात बालिका बध जैसे जघन्य कृत्यों से समाज को मुक्त कराना था तो वहीं स्वामी जी की शिक्षा दीक्षा जन्म के सातवें वर्ष अपने गुरु विशेश्वर पुरी जी से प्राप्त की वहीं उन्होंने अपने गुरु केशवदास मुल्तानी से योग साधना में निपुण होने के उपरांत इनका विवाह ग्राम गाजीपुर बाराबंकी निवासी क्षत्रिय कन्या मोतिन कुँवरि से हुआ जो सर्व गुण संपन्न परम धर्म परायण एवं चरण अनुरागी महिला थी जिसके बाद स्वामी जी के पांच पुत्रों एवं दो पुत्रियों ने जन्म लिया।


वहीं इनकी पुत्री की विवाह का एक किस्सा बहुत ही प्रचलित है यह उस समय की बात है जब जगजीवन दास साहेब जी की पुत्री का विवाह तिलोई राज्य के राजा के साथ सुनिश्चित हुआ था वही विवाह हेतु बारात स्वामी जी के निवास स्थान सरदहा आई तो राजा ने भोजन में मांस खाने की मांग की ,

तो स्वामी जी ने सब्जी हेतु आए बैगन को मसाला लगाकर बनाने की आज्ञा दी और राजा साहब से कहला भेजा कि आपकी प्रसन्नता में ही हमारी प्रसन्नता है जब बारातियों को भोजन में वही मसाला लगा बैगन की सब्जी परोसी गई तो मांस खाने वालों को मांस जैसे स्वाद सा प्रतीत हुआ और उन लोगों ने प्रसन्नता पूर्वक भोजन ग्रहण किया परंतु तभी से सत्यनाम पंथ के अनुयायियों एवं भक्तों के लिए मांस खाना वर्जित हो गया है

सत्यनाम पंथ का हुआ अवतरण

सर्व समर्थ स्वामी जगजीवन दास जी द्वारा प्रवर्तित सतनाम पंथ के अवतरण के बारे में जानकारी अनुसार 7 वर्ष की आयु में स्वामी जी ने 12 वर्षों तक अनवरत ध्यान समाधि लगाई और सच्चिदानंद भगवान के दर्शन प्राप्त करके आदेशानुसार सतनाम पंथ की स्थापना की जिसका उद्देश्य समाज सुधारक,

दलितों का उत्थान, रूढ़िवादिता, सुसंस्कृत सामाजिक मर्यादाओं का दर्शन प्रस्तुत करना था।

वही स्वामी जी ने सतनाम पंथ के प्रचार-प्रसार हेतु उनके चार प्रमुख उनके शिष्यों ने सत्यनाम पथ का प्रचार प्रसार किया वहीं सतनाम पंथ की स्थापना लगभग 325 वर्ष पूर्व हुई जिसका प्रचार प्रसार उत्तर भारत के समस्त हिंदी भाषी प्रांतों तथा नेपाल राज्य तक हुआ,

तो वही सत्यनाम पंथ के अनुयायी अपने जाति बोधक नाम के स्थान पर दास शब्द का प्रयोग करते हैं जो कि भाव का सूचक होने के साथ-साथ जातिवाद भेदभाव के आडंबर से मुक्त समभाव का प्रतीक है ।

क्यों और कैसे हुआ प्रसिद्ध कोटवाधाम

जगजीवन दास अपनी जन्म स्थली सरदहा को त्याग कर कोटक वन जो बाद में कोटवन तदुपरांत कोटवा जगजीवन दास तथा वर्तमान समय में श्री कोटवा धाम नाम से विख्यात है

यहीं पर आकर अपनी कुटिया बना ली और ध्यान एवं ईश्वर की उपासना करने लगे तथा भक्तों को ज्ञान का उपदेश देने लगे।

और साथ ही सतनाम पंथ में सिद्धांतों के लिए लिखित रूप से अभी कुछ तथ्य प्राप्त नहीं हुए हैं परंतु कीरत सागर ग्रंथ के अनुसार समय-समय पर आवश्यकतानुसार कुछ नियम अवश्य बनाए गए हैं जिनका अनुपालन स्वामी जी

के वंशजो एवम उनके अनुयायियों को भी पालन करना पड़ता था परंतु पंत के विरोध अमर्यादित आचरण करने वालों को पंथ से बहिष्कृत कर दिया जाता था।

इसी प्रकार 90 वर्ष की आयु तक समर्थ जगजीवन दास जी ने सत्य नाम पंत के माध्यम से लोग हितार्थ कल्याणकारी कृतियों द्वारा जनमानस में नवचेतना का संचार किया और आदर्श जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त किया जब स्वामी जी द्वारा प्रवर्तित सतनाम पंथ के द्वारा स्थापित संगठन द्वारा सुचारू रूप से प्रचार-प्रसार एवं जन कल्याण के कार्य करने लगा तो संवत 1817 की वैशाख कृष्ण सप्तमी मंगलवार सन 1807 ईस्वी को समर्थ स्वामी जगजीवन दास जी ने शरीर का त्याग कर परमधाम बैकुंठ लोक को प्रस्थान किया

वर्तमान समय में समर्थ स्वामी जगजीवन दास जी द्वारा प्रवर्तित सतनाम पंथ का मूल केंद्र उनकी तपोभूमि एवं समाधि स्थली श्री कोटवा धाम थाना बदोसराय जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश जहां उनके वंशजों द्वारा पंत के प्रचार-प्रसार आज का संचालन अभी भी होता है

और आज भी उनके जन्म दिवस के शुभावसर पर माघ शुक्ल की सप्तमी को बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है जिसमें दूर दराज से भक्त भारी संख्या में बाबा के दर्शन हेतु आते है और हर मंगलवार को श्री जगजीवन साहेब के दरबार मे भक्तो का तांता लगता है

वही लोगो का कहना है कि बाबा के दरबार मे मांगी हुई सारी मंन्नते पूरी होती है, वही मन्दिर परिसर में ही एक विशाल अभरन कुंड स्थापित है जिसकी शोभा आज भी दिव्यमान है।

Comments